ईरान युद्ध सिर्फ ग्लोबल मार्केट में तेल के दाम ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि तेल की पेमेंट करेंसी में बड़े फेरबदल कर रहा है. ईरान पर अमेरिका के हमले के बाद एक अलग गुट मजबूत हो रहा है. ये गुट अमेरिका के डॉलर के दबदबे को कमजोर करने के लिए साथ आ रहे हैं. युद्ध के दौरान ईरान ने शर्त रखी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को टोल टैक्स का भुगतान करना होगा. ये रकम रियाल या चीनी करेंसी युआन में चुकानी होगी.
ईरानी तेल की खरीद के लिए भी पेमेंट करेंसी युआन या रियाल तय कर दी गई. सिर्फ ईरान ही नहीं इससे पहले रूस ने भी अपने तेल के लिए ऐसी ही शर्त रखी है. इन शर्तों का मकसद सिर्फ एक है, अमेरिकी करेंसी डॉलर के दबदबे को कमजोर करना. डॉलर कमजोर होगा, मतलब अमेरिका की ताकत घटेगी. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रतिबंधों के चलते रूस तेल के बदले अमेरिकी डॉलर में पेमेंट लेने से कतरा रहा है. उसने चीनी करेंसी युआन में पेमेंट लेना शुरू किया है.
रूसी तेल कारोबारियों ने भारतीय रिफाइनरियों से अमेरिकी डॉलर के बजाय चीनी युआन में भुगतान करने का अनुरोध किया है. ईरान युद्ध के बीच अमेरिका ने 1 महीने के लिए रूसी तेल पर प्रतिबंध को हटाया है, जिसके बाद भारतीय रिफाइरियों ने भर भरकर रूसी तेल का आर्डर बुक कर रही हैं. अप्रैल महीने में 6 करोड़ बैरल रूसी तेल की डिलीवरी होगी. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक तेल के बदले लेनदेन के लिए रूसी सप्लायरों ने चीनी करेंसी की मांग की है. उन्होंने भारतीय तेल कंपनियों के लिए विशेष विदेशी बैंक खातों में भारतीय रुपया जमा करने को कहा है, जहां से वो उसे चीनी युआन में बदल रहे हैं. अगर आंकड़ों में देखें तो साल 2024 में रूस और चीन के बीच 82% व्यापार युआन में हुआ. रूस ने तेल, गैस, कोल के लिए युआन में पेमेंट लेना शुरु कर दिया.
सिर्फ रूस और ईरान ही नहीं चीन के साथ व्यापार बढ़ने के कारण कई देश अब युआन में लेनदेन को स्वीकार कर रहे हैं.युआन की बढ़ती ताकत से जहां अमेरिकी डॉलर कमजोर होगा, वहीं ग्लोबल मार्केट में युआन की ताकत बढ़ेगी. चीन की करेगी का ग्लोबल मार्केट में दबदबा बढ़ेगा. मौजूदा वक्त में एक युआन 13.50 भारतीय रुपये के बराबर है. तेल के कारोबार में इसकी बढ़ती ताकत इसका वैल्यूएशन बढ़ाएगी. चीन की ताकत बढ़ना भारत के लिए खतरा है. राजनीतिक तौर पर चीन और रूस की बढ़ती दोस्ती भारत की मुश्किल बढ़ा सकती है.युआन की स्वीकार्यता बढ़ने से उसकी वैल्यू बढ़ेगी, जिससे युआन के सामने रुपया कमजोर हो सकता है. रुपया कमजोर होने का मतलब है आयात लागत बढ़ना. चीन की चालबाजी से भारत वाकिफ है. वो कब पलट जाए इसका किसी को पता नहीं. युआन की ताकत बढ़ने से भारत की इकोनॉमी को झटका लग सकता है.
