वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत महंगे कच्चे तेल के झटके को संभाल पाएगा? S&P ग्लोबल रेटिंग्स के मुताबिक, अगर साल 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो भारत की GDP ग्रोथ में 80 बेसिस पॉइंट तक की गिरावट आ सकती है.
हालांकि, एजेंसी ने ये भी कहा है कि भारत की मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक्स स्थिति और वित्तीय क्षेत्र की मजबूती इस झटके के असर को काफी हद तक कम कर सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, तनावपूर्ण स्थिति में FY27 में कंपनियों की EBITDA (कमाई) में 15-25% तक गिरावट आ सकती है. इसके साथ ही कर्ज (लिवरेज) 0.5 से 1 गुना तक बढ़ सकता है. बैंकिंग सेक्टर की एसेट क्वालिटी पर भी दबाव दिख सकता है और खराब कर्ज (NPA) बढ़कर करीब 3.5% तक पहुंच सकता है.
S&P ने कहा कि भारत मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के असर से अछूता नहीं है. ऊंची कीमतें और सप्लाई में बाधाएं कई महीनों तक बनी रह सकती हैं. इससे घरों, कंपनियों और बैंकों की आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ेगा. रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि भारत के कॉरपोरेट बैलेंस शीट मजबूत हैं. बैंक पर्याप्त पूंजी से लैस हैं और देश की बाहरी स्थिति भी स्थिर है. ये सभी इस संकट के असर को कम करने में मदद करेंगे.
अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो:
चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है
अनुमान है कि हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से CAD में 0.4% GDP तक इजाफा हो सकता है
रुपये पर दबाव बढ़ सकता है
आयात बिल में तेजी आ सकती है
इसके अलावा, महंगा तेल कंपनियों की लागत बढ़ाएगा. मुनाफा घटाएगा. उपभोक्ता महंगाई बढ़ाएगा और सरकार पर सब्सिडी का बोझ डाल सकता है.
केमिकल, रिफाइनिंग और एविएशन सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर और यूटिलिटी सेक्टर अपेक्षाकृत स्थिर रह सकते हैं. S&P के मुताबिक, भारत कुछ महीनों तक ज्यादा तेल कीमतों और सप्लाई से जुड़ी बाधाओं को झेल सकता है.
लेकिन, अगर ये स्थिति लंबी चली, तो आर्थिक ग्रोथ, राजकोषीय संतुलन और बाहरी स्थिति पर बड़ा खतरा बन सकता है. एजेंसी का मानना है कि फिलहाल भारत के पास इस तरह के झटकों को संभालने के लिए पर्याप्त क्षमता है. लेकिन लंबे समय तक जारी संकट स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना सकता है.
