सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे की ज़मीन से कब्ज़ा हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि कब्ज़ा करने वाले लोग रहने का अधिकार नहीं मांग सकते। कोर्ट ने प्रभावित परिवारों की पहचान करने का निर्देश दिया है और अधिकारियों से 19 मार्च के बाद कैंप लगाने को कहा है ताकि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन आसानी से मिल सकें। जो परिवार हटाए जाएंगे, उन्हें छह महीने तक हर महीने ₹2,000 की मदद मिलेगी। अप्रैल में अगली सुनवाई तक कोई बेदखली नहीं होगी।
आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 31 मार्च तक रिपोर्ट तलब की है। इस रिपोर्ट में प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि साल 2019 की पुनर्वास नीति के तहत अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। साथ ही, कोर्ट ने विशेष रूप से यह भी पूछा है कि इस नीति के मानकों के आधार पर किन-किन परिवारों को पुनर्वास सहायता प्राप्त करने का कानूनी अधिकार होगा, ताकि पात्र लोगों की पहचान कर उन्हें राहत दी जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
गतिरोध अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रह सकता
प्रभावित परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करने में मदद के लिए मौके पर विशेष पुनर्वास कैंप लगाए जाएं। रेलवे की ओर से बताया गया कि परियोजना के तहत लाइन के रियलाइन्मेंट के लिए 30.65 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है साथ ही, जिन संरचनाओं को ध्वस्त किया गया है, उनके लिए प्रत्येक प्रभावित परिवार को छह महीने की अवधि तक 2000 रुपये प्रतिमाह देने का प्रस्ताव है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने याचिकाकर्ताओं की आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की श्रेणी में आएंगे अदालत ने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार की पात्रता का निर्धारण किया जाए, बशर्ते वे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन प्रस्तुत करें पीठ ने दोहराया कि पुनर्वास प्रक्रिया को स्पष्ट और पारदर्शी ढंग से आगे बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि पात्र परिवारों को योजना का लाभ मिल सके और परियोजना से जुड़ा गतिरोध समाप्त हो।
वहीं सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि कुछ परिवार छोटे-छोटे भूखंडों के स्वामी के रूप में चिन्हित किए गए है यदि उनकी भूमि ली जाती है तो वह विधिवत अधिग्रहण की कार्यवाही के तहत ही ली जाएगी हालांकि, अतिक्रमणकारियों के संबंध में केंद्र की ओर से कहा गया कि वे वहीं पर पुनर्वास की मांग पर जोर नहीं दे सकते क्योंकि उक्त भूमि बड़े पैमाने पर रेलवे विस्तार परियोजना के लिए आवश्यक है।
सरकार ने यह भी बताया कि पात्र लोगों के पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना लागू है, जिसके तहत याचिकाकर्ता आवेदन कर सकते हैं अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक परिवार की पीएम आवास योजना के तहत पात्रता का निर्धारण तभी होगा जब वे योजना के तहत आवेदन प्रस्तुत करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिला कलेक्टर, अन्य राजस्व अधिकारी तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मिलकर स्थल पर पुनर्वास कैंप आयोजित करें, ताकि प्रत्येक परिवार का मुखिया प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन कर सके कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव, जिला एवं उपमंडल विधिक सेवा प्राधिकरणों के सचिव भी कैंप के दौरान स्थल पर उपस्थित रहें।
राजस्व अधिकारियों को आवेदन प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग देने का निर्देश दिया गया है पीठ ने कहा कि वह सराहना करेगी यदि आवेदन जमा करने की प्रक्रिया 31 मार्च 2026 तक पूरी कर ली जाए साथ ही, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि जब तक सभी पात्र कब्जाधारी आवेदन नहीं कर लेते, तब तक कैंप आयोजित किए जाते रहें अदालत ने दोहराया कि परियोजना से जुड़ा गतिरोध लंबे समय तक नहीं चल सकता और पुनर्वास की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाना आवश्यक है।
