इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर आग लगने के बाद वहां नोटों के मिलने की बात उठी थी. इस मामले की जांच के लिए संसद की एक कमेटी बनाई गई थी. लेकिन अब जस्टिस वर्मा ने उस जांच कमेटी को एक चिट्ठी लिखकर कहा है कि यह जांच निष्पक्ष नहीं है और उन्होंने इससे खुद को अलग कर लिया है.
जस्टिस यशवंत वर्मा इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज थे. इससे पहले वो दिल्ली में हाईकोर्ट में जज थे. कुछ समय पहले उनका तबादला हुआ था. जब वह दिल्ली में कार्यरत थे तो उनके सरकारी बंगले में आग लग गई थी. आग बुझाने के बाद जब लोगों ने देखा तो कहा गया कि बंगले के एक स्टोर रूम में सामान रखने वाले कमरे में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकद पैसे मिले.
इस खबर के आने के बाद बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया.. मामला इतना बड़ा हुआ कि पहले सुप्रीम कोर्ट की एक इन-हाउस कमेटी यानी अंदरूनी जांच कमेटी बनी. फिर संसद ने भी एक अलग जांच कमेटी बनाई जो जजेस इंक्वायरी एक्ट के तहत काम करती है. जस्टिस वर्मा ने संसद की जांच कमेटी को एक चिट्ठी लिखी है. इसमें उन्होंने कई बड़ी बातें कही हैं. पहली बात यह कि जब आग लगी तब वो उस शहर में ही नहीं थे.
संसद की जांच कमेटी को भेजे अपने 13 पेज से इस्तीफे में जस्टिस वर्मा ने जांच पर ही सवाल उठाए हैं. उन्होंने जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.उन्होंने लिखा है कि वो इन कार्यवाहियों से हट रहे हैं, क्योंकि जांच निष्पक्ष नहीं है. उन्होंने लिखा है,”मैं गहरी पीड़ा के साथ ये फैसले ले रहा हूं. मैं अपने फैसले की गंभीरता से पूरी तरह अवगत हूं. इस आशा के साथ यह फैसला ले रहा हूं कि एक दिन इतिहास यह दर्ज करेगा कि हाईकोर्ट के एक वर्तमान जज के साथ जिस प्रकार का अन्याय हुआ, उसने इस पूरे प्रकरण को शुरुआत से ही प्रभावित किया है.”
दूसरी बात यह कि स्टोर रूम की चाबी न तो उनके पास थी और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य के पास थी. तीसरी बात यह कि बंगले में जो सीसीटीवी कैमरे लगे थे और जो केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवान सुरक्षा में तैनात थे, वो सब उनके नियंत्रण में नहीं थे.
यानी वो उन्हें हटा नहीं सकते थे या उनसे छेड़छाड़ नहीं कर सकते थे. चौथी बात यह कि अगर कोई पैसे छुपाना चाहता तो वो कभी सरकारी बंगले के स्टोर रूम में नहीं रखता जहां इतनी सुरक्षा हो. यह बात ही समझ में नहीं आती.
